हासिये में लिखा है दर्द ! urdu gazal ! khud ki kalam se

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हासिये में लिखा है दर्द ,इसे छुपाकर  रखना है ।।

पूछेगा राज कोई गम का , बस खुश हूँ बताकर हंसना है ।।

कितना  टुटा हूँ अंदर से कोई अंदाजा न लगा  ले  !

बस दिखू हँसता सबको , खुद को ऐसा बनाकर रखना है !!

और लिखता रहूंगा हर लम्हा की कैसे गुजारा है मेने !

बस नाम नहीं उसका बे-नाम लगाकर लिखना है !!

कब तक तन्हाई की आग में सुलगता रहेगा मुकेश !

खुद को अब चिराग जैसे जल-जलाकर बुझना है !!

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बहुत कुछ लगाना पड़ता है ,एक आशिया बनाने में !
लोग एक पल भी नहीं लगाते आग लगाने में !!

कैसे देखता सपने ,कभी सोया ना गहरी निंदो में !
मैने जग-जग कर गुजारी थी राते उसे सुलाने में !!

कैसे बताऊ की किन किन इम्तिहानो से गुजर कर आया हूँ !
मेरे प्यार को आजमाया था सिर्फ प्यार को भुलाने में !!

इतना मुश्किल नहीं था मेरे लिए मंजिल को पा लेना !
कमबख्त मेरे अपनों ने कसर नहीं छोड़ी मुझे गिराने में !!

मत बदलो रुख यूँ , की कोई जलता द्वीप बुझ जाये !
मुद्द्ते लग जाती है एक चिराग जलाने में !!

कहाँ है मुहब्त की स्याही इतनी गहरी, की सब्दो को उकेर सकूँ !
थोड़ा दर्द भी तो चाहिए कलम को चलाने में !!

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रंग तो पते भी बदलते रहते है ।

जमी पे जो सूखे है, शाख पे वो  हरे रहते है !!

मत कर गुमा की वो सिर्फ तेरा है !

यहाँ वक्त- बे वक्त  रिश्ते बदलते  रहते है !!

क्या हुआ जो एक शाख गिर गई टूटकर  !

फूल रुख पर भी तो खिलते रहते है !!

चाहे कितनी कर लो कोशिशें रूह से रूह मिलाने  की !

यहां अक्सर चहरे देख दिल मचलते रहते है !!

क्या हुआ जो हो ना पाया, जहाँ में अपना कोई !

बिन माली के बगीचे भी तो फलते-फुलते रहते है !

बेहतर है पाव काट लो गर कटे ना जंजीर गुलामी की !

स्वाधीन लड़खड़ाकर भी तो  चलते रहते है !!

क्या हुआ जो वो रिश्ता तोड़ कर चला गया !

लोग बिखरे हुए भी तो सम्भलते रहते है  !!

मत लगाओ बस्ती में आग, इस महजबी तिल्ली से !

शमा के साथ परवाने भी तो जलते रहते है !!

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जायज नहीं है ये , इसारे जो नाजायज करते रहते हो !
खुद को मौन कहकर , शौर जो मचाते रहते हो !

रुलाता बहुत है मंजर ये , जिसमें तुम हँसते रहते हो !!
कर के अपनों से गीले- सिखवे, गीत अब गेरो के गाते रहते हो !!

कुछ नहीं रखा इन गलियों में , सच क्यों नहीं बताते हो !!
राते गुजरी है मेरी वहां , जहां तुम दिन बिताते रहते हो !

पता है सब कुछ , सच को क्यों झूठ बनाते रहते हो !
कई दाग लगे है उस पे , जो सेज तुम बे-दाग बताते रहते हो !!

जो अपना नहीं , फिर क्यों अपना हक जताते रहते हो !
भुला देना ठीक है उन लम्हो को , जो फालतू में किस्से सुनाते रहते हो !!

फिर क्यों खुद को इतना बड़ा लिखारी बताते रहते हो !
पता है , हर शेर खुद की कलम से चुराते रहते हो !
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𝐤𝐡𝐮𝐝𝐤𝐢𝐤𝐚𝐥𝐚𝐦_

 

शीशा भी कहाँ सही बताता है !
एक दिखाकर चेहरा एक छुपाना चाहता है !!

बिठाऊ में जिसे भी बगल में अपनी !
कमबख्त मुझे वही गिराना चाहता है !!

कब तक उसे में अपना समझता रहूंगा !
सुना है वो हक कहीं और जताना चाहता है !!

कहां यकीन ,और किस पर विश्वास करूं !
यहाँ हर कोई सच को छुपाना चाहता है !!

गिरकर उठना फिर चल देना यही मंजिल का मार्ग है !
कौन है यहां जो सफलता का मंत्र सीखाना चाहता है !!

किसका लिखा है, क्या कुछ पढ़कर पहचान पाओगे !
यहां हर-कोई खुद की कलम चलाना चाहता है !!

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पढ़ोगे किरदार मोहब्बत के, तो परेशान हो जाओगे ।
यक़ीन नहीं तो कर के देखलो, तजुर्बान हो जाओगे ।।

जिस्मों में पलती है , मोहब्बतें आजकल ।
-गर धड़कनों में उतार लोगे , तो बे-जान हो जाओगे ।।

पाबंदिया ना है ऐ-दोस्त उम्र के किसी पड़ाव की ।
-गर मिली महबूबा रंगीन, तो जवान हो जाओगे ।।

ओर खुलेआम होते है, जिस्मों के काले कारोबार ।
-गर तुम हुऐ सरे-आम, तो बे-ईमान हो जाओगे ।।

झूठ का साया छोड़ दिया तो ज़रा सम्भलकर चलना मुकेश ।
-गर बोले सच्चाई, तो बे-जुबान हो जाओगे ।।

®writer-@mukeshpareek__

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Mukesh Pareek
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